तेरे बिना अधूरी थी मैं

Title: “तेरे बिना अधूरी थी मैं”
(एक प्रेम कथा जो दिल को छू जाए)
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पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से कस्बे में, जहां हर सुबह सूरज की पहली किरणें झील के पानी में उतरकर उसे सोने सा बना देती थीं, वहाँ रहती थी “अनन्या” — किताबों में खोई, खामोश-सी एक लड़की। उसकी आँखों में एक अधूरी तलाश थी, जैसे वो किसी को महसूस करती थी लेकिन पा नहीं सकी थी। हर शाम वह झील किनारे बैठकर वही एक गीत गुनगुनाया करती, जिसका कोई सुनने वाला नहीं था — सिवाय उस हवा के, जो हर बार उसके आंसुओं को चुपचाप चुरा लेती।
अनन्या की दुनिया में सब कुछ था, पर प्यार नहीं। और शायद वो अब प्यार में यकीन भी नहीं रखती थी। जब भी कोई उसकी मुस्कान की वजह पूछता, वह कहती, “कुछ बातें अधूरी ही खूबसूरत होती हैं।”
फिर उसकी ज़िंदगी में आया “अशोक”।
एक दिन, जब बारिश के बाद की गीली ज़मीन पर अनन्या किताबों के पन्ने समेट रही थी, अशोक वहीं पास के कॉफी हाउस से बाहर निकला। उसके हाथ में एक गिटार था और आँखों में कुछ कह देने की बेचैनी। उसने अनन्या को देखा, और वक्त वहीं थम गया। कुछ पल यूँ ही बीते, जैसे दो रूहें एक-दूसरे को पहचान रही थीं।
“माफ़ कीजिए,” उसने कहा, “ये आपकी किताब है?”
अनन्या ने धीरे से सिर हिलाया। और फिर… मुस्कुराई। वही मुस्कान, जो उसने बरसों बाद किसी अजनबी के लिए महसूस की थी।
उनकी मुलाकातें अब अक्सर होने लगीं।
कभी झील किनारे, कभी उस पुराने मंदिर की सीढ़ियों पर, कभी बारिश में बिना छाते के चलते हुए। अशोक उसे सुनाता था अपनी धुनें, और अनन्या उसे सुनाती थी अपनी ख़ामोशियाँ। और यही ख़ामोशियाँ एक दिन मोहब्बत में बदल गईं।
“क्या तुम्हें मुझसे प्यार हो गया है?” अशोक ने एक दिन पूछा।
अनन्या ने उसकी आँखों में देखा और कहा, “मुझे खुद से प्यार करना तुमसे मिलने के बाद आया है।”
दोनों का प्यार सच्चा था, पर किस्मत को उनकी परीक्षा लेनी थी।
अशोक को अचानक शहर छोड़ना पड़ा। एक गंभीर बीमारी ने उसके गले को जकड़ लिया था — वह अपनी आवाज़ खो सकता था, हमेशा के लिए। उसने अनन्या को बिना बताए इलाज के लिए शहर छोड़ दिया। वो चाहता था, जब लौटे तो पूरा लौटे।
पर उसने यह नहीं सोचा था कि उसकी खामोशी, अनन्या की सबसे बड़ी तकलीफ बन जाएगी।
अनन्या ने महीनों उसका इंतज़ार किया।
हर दिन वो झील के किनारे वही गीत गाती रही। हर बार उम्मीद करती कि वो आएगा, पर वो नहीं आया।
उसका दिल टूट चुका था। लोगों ने कहा, “भूल जाओ उसे,” पर वो कैसे भूल जाती किसी ऐसे को, जिसने उसे जीना सिखाया?
एक दिन, जब उसने अपनी डायरी में आखिरी बार लिखा —
“मैंने उसे नहीं खोया, मैं तो खुद को फिर से पा रही हूँ…”
उसी शाम झील किनारे एक हल्की धुन गूंज उठी।
वो आवाज़, जो उसने सोची थी अब कभी नहीं सुनेगी, उसके कानों में पिघलकर उतरने लगी।
“अशोक…” वह फुसफुसाई।
वो सामने खड़ा था — थोड़ा बदला हुआ, थोड़ा थका हुआ, पर उसकी आँखों में वही प्यार, वही बेचैनी।
“तुमने बहुत देर कर दी,” अनन्या की आँखों में आँसू थे।
“मैं तो हर पल तुम्हारे पास था। सिर्फ एक आवाज़ छिन गई थी, मोहब्बत नहीं।”
उसने अपना गिटार खोला — और पहली बार उसके बजाय अनन्या ने गाया।
अशोक ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस गीत को महसूस किया।
वो पल जैसे दो अधूरी धड़कनों का एक मुकम्मल गीत बन गया था।
अब न कोई खामोशी थी, न कोई दूरी।
बस अनन्या थी। अशोक था। और उनकी मोहब्बत—जो अब किसी वादे की मोहताज नहीं थी।
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कई साल बाद…
वही झील, वही गीली ज़मीन, वही पीले गुलाब।
एक छोटा-सा कॉफी हाउस, जहाँ दीवार पर टंगी एक फोटो में लिखा है:
“तेरे बिना अधूरी थी मैं, और तेरे साथ मुकम्मल हूँ…”
— अनन्या & अशोक ❤️

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